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अनुष्टुप (Anushtup) /

by अनामिका (Anamika).
Published by : Vani Prakashan, (New Delhi :) Physical details: 152 p. ; 23 cm. ISBN:9789389012606 (hbk.). Year: 2019
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बीच का समय -- आधी दुनिया -- कूड़ा बीनते बच्चे -- प्रगौतिहासिक -- प्रदेश का पहला जाड़ा -- बाज़ लोग -- बोहिनाबाई : इक्कीसवीं सदी।

ज्ञान की सीढ़ियां चढ़ते हुए आप जिस संज्ञान तक पहुँचते हैं, शब्दों की सीढ़ियों चढ़ते हुए जिस गहन मौन तक, मेरा अकेलापन आपके अकेलेपन से जहाँ रु-ब-रु होता है, कविता वहीं एक चटाई-सी बिछाती है कि पदानुक्रम टूट जायें, भेद-भाव की सारी संरचनाएँ टूट जायें, एक धरातल पर आ बैठे दुनिया के सारे ध्वान्त-आपबीती और जगबीती, गरीब-अमीर, स्त्री-पुरुष, श्वेत-अश्वेत, दलित-गैरदलित, देहाती-शहराती, लोक और शास्त्र।
कविता के केन्द्रीय औज़ार रुपक और उत्प्रेक्षा भेदभाव की सारी संरचनाएँ तोड़ते हुए एक झप्पी-सी घटित करते हैं-मैक्रो-माइक्रो, घरेलू और दूरस्थ वस्तुजगत के बीच सहकारिता के दर्शन में कविता के गहरे विश्वास का एक प्रमाण यह भी है कि जहाँ रूपक न भी देखें, वहाँ नाटक से संवाद, कथाजगत से चरित्र और वृत्तान्त वह उसी हक से उठा लाती है, जिस हक् से हम बचपन में पड़ोस के घर से जामन उठा लाते थे। जामन कहीं से आता है, दही कहीं जम जाता है। यह है बहनापा, जनतंत्र का अधिक आत्मीय, मासूम चेहरा जो कविता का अपना चेहरा है।
बहुकोणीय अगाधता ही कविता का सहज स्वभाव है। वह स्वभाव से ही अन्तर्मुखी है, कम बोलती है, और जो बोलती है, इशारों में, स्त्री की तरह। जैसे नये पुरुष को नयी स्त्री के योग्य बनना पड़ता है। नये पाठक को कविता का मर्म समझने का शील स्वयं में विकसित करना पड़ता है। कलाकृतियों उत्पाद हो सकती हैं पर उत्पाद होना उनका मूल मन्तव्य नहीं होता। कोलाहल, कुमति और कुत्सित अन्याय के ऋूर प्रबंधन से मुरझाई, की हुई, विशृंखल दुनिया में कुछ तो ऐसा हो जो तांत्रिक उपयोगितावाद के खर्चे से खड़ा होकर मुस्का देने की हिम्मत रखे, जैसे कि प्रेम, शास्त्रीय संगीत, रूपातीत चित्रकला और समकालीन कविता ।
कभी-कभी तो मुझे ऐसा भी जान पड़ता है कि परमाणु में जैसे प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन और न्यूट्रॉन एक अभंग लय में नाचते हैं, कविता में भाव विचार और मौन।

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