Normal view MARC view ISBD view

अपने आकाश में (Apne aakash mein) /

by भार्गव, सविता (Bhargav, Savita)
Edition statement:1st ed. Published by : Rajkamal Prakashan, (New Delhi ;) Physical details: 123 p. ; 22 cm. ISBN:9788126729821 (hbk.). Year: 2017
Tags from this library: No tags from this library for this title. Log in to add tags.
Item type Current location Call number Status Date due Barcode Item holds
Books Books Azim Premji University, Bangalore
General Stacks
891.431 BHA (Browse shelf) Available 46505
Total holds: 0

सीखा है -- सृष्टि -- दरवाजा -- बाहर का दरवाजा -- अधूरा घोंसला -- गौरैया -- इस घर में -- अपने आकाश में -- मैं अकेली कहाँ हूँ -- स्मृति में स्पर्श -- जीने की जगह -- स्त्री सोचती है -- मायके से साथ आईं चीजें -- कामवाली -- पुरानी तसवीर को देखते हुए -- प्यार करने का तरीका -- गालियाँ -- पुरुष होना चाहती हूँ -- स्त्रीत्व क्या है? -- सुनना चाहते हो मुझे -- दूसरे बाज़ार की औरत -- अगले फसाद के लिए -- संसार में जो इतने सारे सागर हैं -- पूर्वजन्म -- मैं स्थिर हूँ लेकिन -- अनचाहा सामान

सविता भार्गव के पहले काव्य-संकतन का नाम था-'किसका है आसमान'। पाँच-छह साल बाद 'किसका जैसे प्रश्न से मुक्त होकर कवयित्री ने स्वय के आकाश की रचना कर ली है। अपने आकाश में' की कविताएँ जीवन-विवेक और काव्य-विवेक में बड़े परिवर्तन का संकेत देती हैं। पहले संकलन में यथार्थ और उसकी जो रचना-कला है, उससे सम्बन्ध बनाए रखते हुए नई 'सामर्थ्य'-जिसमें यथार्थबोध और आत्मबोध का गहरा मुठभेड़ दिखाई पड़ता है-का परिचय दिया गया है। इसे यथार्थ पर रोमॉंटिक वेग के दबाव के रूप में भी देख सकते हैं। सविता कविता में बार-बार अपनी छवि गढ़ने की कोशिश करती हैं। तरह-तरह की छवियाँ। वे छवियाँ निश्चित बेजान होतीं अगर स्वयं तक सीमित होतीं। उनकी शक्ति ये है कि वे एक ओर स्त्री के निगुढ़ संसार को प्रतिबिम्बित करती हैं, दूसरी ओर उस समाज को जिसमें स्त्री साँस लेती है। स्री- छवि को जिस तरह से वे गढ़ती हैं, उसमें पुरुष की अलग से छवि रचने की आवश्यकता बहुत कम रह जाती है। नारीवादी कवयित्रियों से सविता इस मायने में भिन्न हैं कि वे पुरुष समाज के प्रति आलोचना का भाव रखती अवश्य हैं, किन्तु पुरुष के प्रति समूचे मन से निष्ठा का परिचय देती हैं। वे इस विश्वास का परिचय देती हैं कि स्त्री स्वतंत्र तारिका है। लेकिन उसकी आत्मा ईमानदार और सम्पूर्ण पुरुष के प्रति समर्पित है। सविता पुरुष सत्ता का विरोध भी मजे-मजे में करती हैं। एक कविता है-'पुरुष होना चाहती हूँ'। उसमें अपनी देह से पुरुष के 'गुनाह'का आनन्द पुरुष बनकर लिया गया है। सविता में अन्तर्बाधा नहीं है। साहसी कवयित्री हैं-स्त्री के आत्मविश्वास की कवयित्री। अच्छी बात यह है कि स्त्री की 'सच्ची प्रतिमा' गढ़ने की ललक उनकी मुख्य प्रवृत्ति है। सविता में पर्याप्त आत्ममुग्धता है। आत्मरति है। लेकिन वह खटकती नहीं है। उसमें स्त्री के स्वत्व और सत्त्व, दोनों की प्रतिष्ठा का प्रयास दिखाई पड़ता है। दूसरी बात, सविता में 'स्त्री' और 'कवयित्री' का प्रकृति से तादात्म्य विशेष महत्त्व रखता है। प्रकृति उनके लिए जीने और सीखने की सही जगह है; उसी के जरिए सामाजिक अनुभव की कटुता की क्षतिपूर्ति करती हैं। अपने आकाश में' संकलन में काव्य-ऊर्जा का नया क्षेत्र नीगा होता दिखाई पहता है।

There are no comments for this item.

Log in to your account to post a comment.

Teachers Portal | ERP Portal |Sitemap | Credits | Facebook | Youtube© 2017 Azim Premji Foundation | DISCLAIMER